अरहर उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक

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अरहर उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक

भूमिका

arharदलहनी फसलों में अरहर का विशेष स्थान है। अरहर की दाल में लगभग 20-21 प्रतिशत तक प्रोटीन पाई जाती है, साथ ही इस प्रोटीन का पाच्यमूल्य भी अन्य प्रोटीन से अच्छा होता है। अरहर की दीर्घकालीन प्रजातियॉं मृदा में 200 कि0ग्रा0 तक वायुमण्डलीय नाइट्रोजन  का स्थरीकरण कर मृदा उर्वरकता एवं उत्पादकता में वृद्धि करती है। शुष्क क्षेत्रों में अरहर किसानों द्वारा प्राथमिकता से बोई जाती है। असिंचित क्षेत्रों में इसकी खेती लाभकारी सि) हो सकती है क्योंकि गहरी जड़ के एवं अधिक तापक्रम की स्थिति में पत्ती मोड़ने के गुण के कारण यह शुष्क क्षेत्रों में सर्वउपयुक्त फसल है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश देश के प्रमुख अरहर उत्पादक राज्य हैं।

मध्यप्रदेश में दलहनी फसलों के स्थान पर सोयाबीन के क्षेत्रफल में वृद्धि होने से दलहनी फसलों का रकबा घट रहा है। साथ-साथ अरहर फसल का क्षेत्र उपजाऊ समतल जमीन से हल्की ढालू, कम उपजाऊ जमीन पर स्थानांतरित हो रहा है जिससे उत्पादन में भारी कमी हो रही है। परंतु अरहर फसल की व्यापक क्षेत्रों के अनुकुल उच्च उत्पादन क्षमतावाली उकटारोधी प्रजातियों के उपयोग करने से उत्पादकता में होने वाले उतार-चढाव में कमी तथा उत्पादकता में स्थायित्व आया है। सिंचाई, उर्वरक तथा कृषि रसायनों के प्रयोग के बारे में कृषकों की बढ़ती जागरूकता दलहन उत्पादकता बढाने मे सहायक सिद्ध हो रही है। सामायिक बुआई के साथ पर्याप्त पौधों की संख्या, राइजोबियम कल्चर व कवक नाषियों से बीजोपचार तथा खरपतवार प्रबंधन जैसे बिना लागत के अथवा न्यूनतम निवेष वाले आदान भी उत्पादकता की वृद्धि करते है। अरहर दाल के आसमान छूते भाव के कारण फिर से मध्यप्रदेष के किसानों का रूझान अरहर की खेती की ओर बढ़ रहा है।

भारत में दालें प्रोटीन के रूप में भोजन का एक अभिन्न अंग है। टिकाऊ कृषि हेतु मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करने एंव आहार तथा चारे के विभिन्न रूपों में उपयोग आदि दलहनी फसलों के लाभ हैं। अग्रिम पंक्ति प्रदर्षनो द्वारा यह स्पष्ट दर्षाया जा चुका है कि उन्नतषील उत्पादन प्रौद्योगिकी अपनाकर अरहर की वर्तमान उत्पादकता को दुगना तक किया जा सकता है। दलहनी फसलों के पौधों की जड़ों पर उपस्थित ग्रंथियाँ वायुमण्डल से सीधे नत्रजन ग्रहण कर पौधों को देती हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। दलहनी फसले खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा अधिक सूखारोधी होती है। खरीफ की दलहनी फसलों में तुअर प्रमुख है। मध्य प्रदेश में अरहर को लगभग 5.3 लाख हेक्टर भूमि में लिया जाता है जिससे औसतन 530.5 (2011-12) किलो प्रति हेक्टर उत्पादन होता है। मध्यप्रदेश से अरहर की नई प्रजातियां जे.के.एम.-7, जे.के.एम.-189 व ट्राम्बे जवाहर तुवर-501, विजया आई.सी.पी.एच.-2671 (संकर) दलहन विकास परियोजना, खरगोन द्वारा विकसित की गई है। अरहर को सोयाबीन के साथ अंतरवर्तीय फसल के रूप में लगाने की अनुषंसा कर करीब एक से दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र का रकबा मध्यप्रदेष में बढ़ाया जा सकता है। अरहर फसल के बाद में रबी फसल भी समय पर ली जा सकती है। अतः ये जातियां द्विफसली प्रणाली में उपयुक्त है।

हल्की दोमट अथवा मध्यम भारी प्रचुर स्फुर वाली भूमि, जिसमें समुचित पानी निकासी हो, अरहर बोने के लिये उपयुक्त है। खेत को 2 या 3 बाद हल या बखर चला कर तैयार करना चाहिये। खेत खरपतवार से मुक्त हो तथा उसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था की जावे।

भूमि का चुनाव एवं तैयारी:-

अरहर की फसल के लिए समुचित जल निकासी वाली मध्य से भारी काली भूमि जिसका पी.एच. मान 7.0-8.5 का हो उत्तम है। देशी हल या ट्रैक्टर से दो-तीन बार खेत की गहरी जुताई क व पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करें।

जातियों का चुनाव:

बहुफसलीय उत्पादन पद्धति में या हल्की ढलान वाली असिंचित भूमि हो तो जल्दी पकने वाली जातियाँ बोनी चाहिए। निम्न तालिका में उपयुक्त जातियों का विवरण दिया गया हैः

तालिका-1: अरहर की किस्मे (कम अवधि)

अरहर की किस्में/विकसितवर्ष उपज क्वि./हे. फसल अवधि विशेषताऐं
उपास-120 (1976) 10-12 130-140 असीमित वृद्धिवाली, लाल दानेकी , कम अवधि मेंपकने वाली जाति
आई.सी.पी.एल.-87 (प्रगति,1986) 10-12 125-135 सीमित वृद्धि की कम अवधिमेंपकती है। बीज गहरा लाल मध्यम आकार का होता है।
ट्राम्बे जवाहर तुवर-501 (2008) 19-23 145-150 असीमित वृद्धि वाली,लालदाने की , कम अवधि में पकने वाली, उकटा रोगरोधी जाति है।

मध्यम गहरी भूमि मंे जहाँ पर्याप्त वर्षा होती हो और सिंचित एंव असिंचित स्थिति में मध्यम अवधि की जातियाँ बोनी चाहिए। निम्न तालिका में उपयुक्त जातियों का विवरण दिया गया हैः

तालिका-2 अरहर की किस्मे ( मध्यम अवधि)

अरहर की किस्में/विकसित वर्ष उपज (क्वि/हे.) फसल अवधि विशेषताऐं
जे.के.एम.-7 (1996) में 20-22 170-190 असीमित वृद्धि वाली, भूरा-लाल दाना मध्यम आकार का होता है। यह उकटा रोधक जाति है।
जे.के.एम.189 (2006) में 20-22 अर्धसिंचित में 30-32 160-170 असीमितवृद्धि वाली, हरी फल्ली काली धारियों के साथ, लाल-भूरा बड़ा दाना, 100 दानों का वजन 10.1 ग्राम व उकटा,बांझपन व झुलसा रोग रोधी एवं सूत्र कृमी रोधी एवं फली छेदक हेतु सहनषील, देरसे बोनी में भी उपयुक्त
आई.सी.पी.-8863(मारुती,1986) 20-22 150-160 असीमित वृद्धि वाली, मध्यम आकार का भूरा लाल दाना होता है। यह उकटा रोधक जाति है। इस जाति में बांझपन रोग का प्रभाव ज्यादा होता है।
जवाहर अरहर-4(1990) 18-20 180-200 असीमित वृद्धि वाली, मध्यम आकार का लाल दाना,फायटोपथोरा रोगरोधी
आई.सी.पी.एल.-87119(आषा1993) 18-20 160-190 असीमित वद्धि वाली, मध्यम अवधि वाली बहुरोग रोधी(उकटा,बांझपनरोग) जाति है। मध्यम आकार का लाल दाना होता है।
बी.एस.एम.आर.-853(वैषाली,2001) 18-20 170-190 असीमित वृद्धि वाली, सफेद दाने की मध्यम अवधि वाली, बहुरोग रोधी( उकटाव बांझपन रोग)
बी.एस.एम.आर.-736(1999) 18-20 170-190 असीमित वद्धि वाली, मध्यम आकार का लाल दाना, मध्यम अवधि वाली, उकटा एवं बांझ रोगरोधक है।
विजया आई.सी.पी.एच.-2671(2010) 22-25 164-184 असीमित वृद्धि वाली, फूल पीले रंग का घनी लाल धारियो वाली, फलियां हल्के बैंगनी रंग एवं गहरा लाल दाने की मध्यम अवधि वाली, बहुरोग रोधी (उकटाव बांझपन रोग)

तालिका-3: उत्तर पूर्व मध्य प्रदेष हेतु उपयुक्त जांतियां (लंबी अवधि )

अरहर की किस्में/विकसित वर्ष उपज क्वि/हे. फसल अवधि विशेषताऐं
एम.ए-3 (मालवीय,1999) 18-20 210-230 असीमीत वृद्धि वाली, भूरे रंग का बड़ा दाना, सूखा एवं बांझपन रोग रोधी, म.प्र.के उत्तर-पूर्व भाग के लिए उपयुक्त
ग्वालियर-3(1980) 15-18 230-240 सीधे बड़वार वाली, लाल बड़ा दाना, गिर्ध क्षेत्र के लिये उपयुक्त

 

उन्नतशील प्रजातियॉं

शीघ्र पकने वाली प्रजातियॉं उपास 120, पूसा 855, पूसा 33, पूसा अगेती, आजाद (के 91-25) जाग्रति (आईसीपीएल 151) , दुर्गा (आईसीपीएल-84031)ए प्रगति।
मध्यम समय में पकने वाली प्रजातियॉं टाइप 21, जवाहर अरहर 4, आईसीपीएल 87119

(आशा) ए वीएसीएमआर 583

देर से पकने वाली प्रजातियॉं बहार, बीएमएएल 13, पूसा-9
हाईब्रिड प्रजातियॉं पीपीएच-4, आईसीपीएच 8
रबी बुवाई के लिए उपयुक्त प्रजातियॉं बहार, शरद (डीए 11) पूसा 9, डब्लूबी 20

अग्रिम पंक्ति प्रदेशन अन्तर्गत शीघ्र, मध्यम व देर से पकने वाली उन्नत प्रजातियों ने विभिन्न स्थानीय/पुरानी प्रजातियों की अपेक्षा क्रमशः 94, 36 एवं 17 प्रतिशत अधिक उपज प्रदान की हैं। प्रमुख अरहर उत्पादक राज्यों हेतु संस्तुत उन्नत प्रजातियों की उपज निम्न तालिका में दर्शायी गयी है।

राज्य प्रजाति उपज कि0ग्रा0/है0 %वृद्धि
शीघ्र
हरियाणा एच0 82-1 (पारस)

1127

पंजाब पी0पी0एच0-4 (हाइब्रिड)

ए0एल0-201

1400

1295

उत्तर पद्रेश उपास-120

स्थानीय

1295

817

46.8

उड़ीसा उपास-120

गोकनपुर

337

173

94.8

तमिलनाडु सी0ओ0पी0एच0-2

सी0ओ0-5

850

610

39.3

मध्यम

महाराष्ट्र आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

वी0एस0एम0आर0-583

स्थानीय

स्थानीय

1410

2185

1060

1278

33.0

70.9

गुजरात आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

जे0के0एम0-7

टी0-21

वी0डी0एन0-2

1762

1400

1207

887

45.9

57.8

छत्तीसगढ़ आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

एन0-1481

514

407

26.3

मध्य प्रदेश आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

ए0के0पी0जी0-4101

जी0टी0-100

स्थानीय

वी0डी0एन0-2

स्थानीय

वी0डी0एन0-2

1410

1350

1600

1256

1060

1000

950

836

33.0

35.0

68.4

56.2

कर्नाटक आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

स्थानीय

1465

1240

18.4

आन्ध्र प्रदेश आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

1905

1452

31.1

देर

बिहार पूसा-9

शरद

2142

2034

5.3

पूर्वीउत्तर प्रदेश बहार

1995

अंतरवर्तीय फसल:-

अंतरवर्तीय फसल पद्धति से मुख्य फसल की पूर्ण पैदावार एंव अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्त पैदावार प्राप्त होगी । मुख्य फसल में कीडों का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता होने पर किसी न किसी फसल से सुनिश्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पद्धति में कीडों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। निम्न अंतरवर्तीय फसल पद्धति मध्य प्रदेष के लिए उपयुक्त है।

  • अरहर $ मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों कें अनुपात में (कतारों दूरी 30 से.मी.)
  • अरहर $ उडद या मूंग 1:2 कतारों कें अनुपात में (कतारों दूरी 30 से.मी.)
  • अरहर की उन्नत जाति जे.के.एम.-189 या ट्राम्बे जवाहर तुवर-501 को सोयाबीन या मूंग या मूंगफली के साथ अंतरवर्तीय फसल में उपयुक्त पायी गई है।

बोनी का समय व तरीका:-

अरहर की बोनी वर्षा प्रारम्भ होने के साथ ही कर देना चाहिए। सामान्यतः जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करें। कतारों के बीच की दूरी शीघ्र पकने वाली जातियों के लिए 60 से.मी. व मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 70 से 90 से.मी. रखना चाहिए। कम अवधि की जातियों के लिए पौध अंतराल 15-20 से.मी. एवं मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 25-30 से.मी. रखें।

बीज की मात्रा व बीजोपचारः-

जल्दी पकने वाली जातियों का 20-25 किलोग्राम एवं मध्यम पकने वाली जातियों का 15 से 20 कि.ग्रा. बीज/हेक्टर बोना चाहिए। चैफली पद्धति से बोने पर 3-4 किलों बीज की मात्रा प्रति हैक्टेयर लगती है। बोनी के पूर्व फफूदनाशक दवा 2 ग्राम थायरम $ 1 ग्राम कार्बेन्डेजिम या वीटावेक्स 2 ग्राम $ 5 ग्राम ट्रयकोडरमा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। उपचारित बीज को रायजोबियम कल्चर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर लगावें।

निंदाई-गुडाईः-

खरपतवार नियंत्रण के लिए 20-25 दिन में पहली निंदाई तथा फूल आने के पूर्व दूसरी निंदाई करें। 2-3 कोल्पा चलाने से नीदाओं पर अच्छा नियंत्रण रहता है व मिट्टी में वायु संचार बना रहता है । नींदानाषक पेन्डीमेथीलिन 1.25 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व / हेक्टर बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है । नींदानाषक प्रयोग के बाद एक नींदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्था पर करना लाभदायक होता है।

सिंचाईः-

जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ एक हल्की सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियाँ बनने की अवस्था पर करने से पैदावार में बढोतरी होती है।

पौध संरक्षण:-

अ. बीमारियाँ एवं उनका नियंत्रण:-

  • उकटा रोग: यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणतया फसल में फूल लगने की अवस्था पर दिखाई पडते है। सितंबर से जनवरी महिनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है । इसमें जडें सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उचाई तक काले रंग की धारिया पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिए रेागरोधी जातियाँ जैसे जे.के.एम-189, सी.-11, जे.के.एम-7, बी.एस.एम.आर.-853, 736 आशा आदि बोये। उन्नत जातियों को बीज बीजोपचार करके ही बोयें । गर्मी में गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम रहता है।
  • बांझपन विषाणु रोग: यह रोग विषाणु (वायरस) से होता है। इसके लक्षण ग्रसित पौधों के उपरी शाखाओं में पत्तियाँ छोटी, हल्के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल-फली नही लगती है। यह रोग माईट, मकड़ी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्मों को लगाना चाहिए। खेत में बे मौसम रोग ग्रसित अरहर के पौधों को उखाड कर नष्ट कर देना चाहिए। मकड़ी का नियंत्रण करना चाहिए। बांझपन विषाणु रोग रोधी जातियां जैसे आई.सी.पी.एल. 87119 (आषा), बी.एस.एम.आर.-853, 736 को लगाना चाहिए।
  • फायटोपथोरा झुलसा रोग: रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें तने पर जमीन के उपर गठान नुमा असीमित वृद्धि दिखाई देती है व पौधा हवा आदि चलने पर यहीं से टूट जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्सील फफॅंूदनाशक दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुआई पाल (रिज) पर करना चाहिए और चवला या मूँग की फसल साथ में लगाये। रोग रोधी जाति जे.ए.-4 एवं जे.के.एम.-189 को बोना चाहिए।

कीट:-

  • फली मक्खी:- यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ बनकर बाहर आती है। जो वृद्धिरत फलियों में अंडे रोपण करती है। अंडों से मेगट बाहर आते है ओर दाने को खाने लगते है और फली के अंदर ही शंखी में बदल जाती है जिसके कारण दानों का सामान्य विकास रूक जाता है। दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है और दानों का आकार छोटा रह जाता है एवं बाद में प्रौढ बनकर बाहर आती है, जिसके कारण फली पर छोटा सा छेद दिखाई पडता है। फली मक्खी तीन सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।
  • फली छेदक इल्ली:- छोटी इल्लियाँ फलियों के हरे ऊत्तकों को खाती हैं व बडे होने पर कलियों, फूलों, फलियों व बीजों को नुकसान करती है। इल्लियाँ फलियों पर टेढे-मेढे छेद बनाती है। इस कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है। इल्लियाँ पीली हरी काली रंग की होती हैं तथा इनके शरीर पर हल्की गहरी पट्टियाँ होती हैं । शंखी जमीन में बनाती है प्रौढ़ रात्रिचर होते है जो प्रकाष प्रपंच पर आकर्षित होते है। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती हैं।
  • फली का मत्कुण:- मादा प्रायः फलियों पर गुच्छों में अंडे देती है। अंडे कत्थई रंग के होते है। इस कीट के शिशु एवं वयस्क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं , जिससे फली आड़ी-तिरछी हो जाती है एवं दाने सिकुड़ जाते है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करते है।
  • प्लू माथ :- इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विष्टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दाने के आसपास लाल रंग की फफूँद आ जाती है। मादा गहरे रंग के अंडे एक-एक करके कलियों व फली पर देती है। इसकी इल्लियाँ हरी तथा छोटे-छोटे काटों से आच्छादित रहती है। इल्लियाँ फलियों पर ही शंखी में परिवर्तित हो जाती है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करती है।
  • ब्रिस्टल ब्रिटलः ये भृंग कलियों फूलों तथा कोमल फलियों को खाती है। जिससे उत्पादन में काफी कमी आती है। यह कीट अरहर, मूंग, उडद तथा अन्य दलहनी फसलों को नुकसान पहुचाता है। सुबह-षाम भृंग को पकडकर नष्ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

कीट नियंत्रणः-

कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित संरक्षण प्रणाली अपनाना आवश्यक है।

  • कृषि कार्य द्वारा:
  • गर्मी में गहरी जुताई करें ।
  • शुद्ध/सतत अरहर न बोयें ।
  • फसल चक्र अपनायंे ।
  • क्षेत्र में एक समय पर बोनी करना चाहिए।
  • रासायनिक खाद की अनुशंसित मात्रा ही डालें।
  • अरहर में अन्तरवर्तीय फसले जैसे ज्वार , मक्का, सोयाबीन या मूंगफली को लेना चाहिए।
    • यांत्रिकी विधि द्वारा:-
      • प्रकाश प्रपंच लगाना चाहिए
      • फेरोमेन टेप्स लगाये
      • पौधों को हिलाकर इल्लियों को गिरायें एवं उनकों इकटठा करके नष्ट करें
      • खेत में चिडियों के बैठने के लिए अंग्रेजी शब्द ’’टी’’ के आकार की खुटिया लगायें।
    • जैविक नियंत्रण द्वारा:-
      • एन.पी.वी. 500 एल.ई./हे. $ यू.वी. रिटारडेन्ट 0.1 प्रतिषत $ गुड 0.5 प्रतिषत मिश्रण का शाम के समय छिडकाव करें।
      • बेसिलस थूरेंजियन्सीस 1 किलोग्राम प्रति हेक्टर $ टिनोपाल 0.1 प्रतिषत $ गुड 0.5 प्रतिषत का छिडकाव करे।
    • जैव-पौध पदार्थों के छिडकाव द्वारा:
      • निंबोली सत 5 प्रतिषत का छिडकाव करें
      • नीम तेल या करंज तेल 10-15 मि.ली.$1 मि.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेन्डोविट, टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
      • निम्बेसिडिन 0.2 प्रतिषत या अचूक 0.5 प्रतिषत का छिडकाव करें ।
    • रासायनिक नियंत्रण द्वारा:-
      • आवष्यकता पडने पर एवं अंतिम हथियार के रूप में ही कीटनाषक दवाओं का छिडकाव करें।
      • फली मक्खी एवं फली के मत्कुण के नियंत्रण हेतु सर्वांगीण कीटनाषक दवाओं का छिडकाव करें जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी. या प्रोपेनोफाॅस-50 के 1000 मिली. मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।
      • फली छेदक इल्लियों के नियंत्रण हेतु – इण्डोक्सीकार्ब 14.5 ई.सी. 500 एम.एल. या क्वीनालफास 25 ई.सी. 1000 एम.एल. या ऐसीफेट 75 डब्लू.पी. 500 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिडकाव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतू प्रथम छिडकाव सर्वांगीण कीटनाषक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्पर्ष या सर्वांगीण कीटनाषक दवाई का छिडकाव करें। तीन छिडकाव में पहला फूल बनना प्रारंभ होने पर, दूसरा 50 प्रतिषत फूल बनने पर और तीसरा फली बनने की अवस्था पर करने से सफल कीट नियंत्रण होता है।
    • कटाई एवं गहाई:-

जब पौधे की पत्तियाँ खिरने लगे एवं फलियाँ सूखने पर भूरे रंग की हो जाए तब फसल को काट लेना चाहिए। खलिहान में 8-10 दिन धूप में सूखाकर ट्रैक्टर या बैलों द्वारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को 8-9 प्रतिषत नमी रहने तक सूखाकर भण्डारित करना चाहिए। उन्नत उत्पादन तकनीकी अपनाकर अरहर की खेती करने से 15-20 क्विंटल/हेक्ट उपज असिंचित अवस्था में और 25-30 क्विंटल/हेक्ट उपज सिंचित अवस्था में प्राप्त कर सकते है।

अरहर की पत्तियों का महत्व

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भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली ने अरहर की कम अवधि (ईएसडी) वाली किस्मों का विकास किया है। आईजीपी क्षेत्र में धान की जगह अरहर की ये किस्में लगा सकते हैं। एक नई  वैज्ञानिक तकनीकी के अंतर्गत अरहर की पत्तियों को खेत में ही गिराकर जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ा सकते हैं। शाकाहारी लोगों के लिए अरहर की दाल से प्रोटीन की पूर्ति की जा सकती है। अरहर की पत्तियों व फलियों के छिलके के लिए पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। यह फसल उगाने से इसकी जड़ों में पाये जाने वाले राइजोबियम जीवाणु, मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि करते हैं। इसके अतिरिक्त अरहर, मृदा क्षरण रोकने व वायु प्रतिरोधक फसल के रूप में भी उपयोगी है। इसे मिश्रित फसलों के रूप में अन्य फसल के साथ उगाकर भी अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है।पशुओं 

 

फसलचक्र में दलहन का समावेश

आने वाले वर्षों में कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती, भूख और कुपोषण से निपटना है। दुर्लभ जल संसाधन, आवर्ती(बार-बार) सूखा, घटती कृषि भूमि के साथ बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन प्रदान करना है। वर्तमान कृषि को उत्पादन उन्मुख से मुनाफे वाली टिकाऊ कृषि में बदलने की आवश्यकता है। भारत में हरित क्रांति से फसल उत्पादन में वृद्धि हुई, लेकिन उर्वरकों की सही मात्रा व अनुपात में उपयोग नहीं करने से मृदा की गुणवत्ता में गिरावट आयी है। हाल ही में मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से जो मृदा आंकड़े सामने आये हैं, उनमें अधिकांश मृदा में जैविक कार्बन की कमी पायी गयी। यह मृदा स्वास्थ्य के लिये सभी आवश्यक पोषक तत्वों को उपलब्ध करने वाला आधार (स्त्रोत) माना जाता है। जैविक कार्बन की कमी का मुख्य कारण है। लगातार पोषक तत्वों का दोहन किया जाना। किसान जैविक कार्बन की पूर्ति के लिये समान्यतः गोबर की खाद का उपयोग करते हैं, इसकी उपलब्धता में कमी के कारण पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं है। किसान के गोबर की खाद की पूर्ति के लिए अन्य स्त्रोतों की आवश्यकता है। इंडो-गंगा के मैदानी (आईजीपी) क्षेत्र में एकल फसलचक्र (धान-गेहूँ) लेने से मृदा स्वास्थ्य में गिरावट आ रही है। कृषि उत्पादकता को बनाए रखने के लिए संतुलित पोषक तत्वों के प्रबंधन की आवश्यकता है। किसान को एकल फसल प्रणाली में बदलाव के साथ फसलचक्र में दलहन का समावेश करना चाहिए।

अरहर की पत्तियों से खाद बनाने की वैज्ञानिक विधि

भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा नई दिल्ली ने पांच वर्षों तक अरहर की पत्तियों को खेत में गिराकर नया अनुसंधान किया है। cMK2 खेत में लगभग 1.2 से 1.4 टन प्रति हैक्टर प्रतिवर्ष पत्तियों के अवशेषों को खेत में मिलाया जाता है। इससे खेत में कार्बन की मात्रा में 0.4 से 0.6 प्रतिशत तक बढ़ोतरी पाई गई। अरहर की खेती दोमट या चिकनी दोमट एवं कपास की भारी काली मृदाओं, जिनमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो, में सफलतापूर्वक की जा सकती है। आर्द्र व शुष्क दोनों प्रकार के गर्म जलवायु के क्षेत्रों में अरहर की खेती की जा सकती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां 1 से 15 जून तक फसल की बुआई करनी चाहिए। हाल के वर्षों में अरहर की अतिरिक्त कम अवधि वाली किस्मों का विकास हुआ है। यह (सारणी-1) परंपरागत किस्मों से तीन से चार सप्ताह पहले परिपक्व हो जाती है। इन किस्मों को धान के स्थान पर ले सकते हैं। और रबी फसल की भी समय पर बुआई की जा सकती है।

सरणी 1. अरहर की कम अवधि वाली उन्नत किस्में क्र.सं. उन्नत किस्में किस्म की गुणवत्ता

क्र.सं उन्नत किस्में किस्म की गुणवत्ता
 1. पूसा-16 वर्ष 2017 में विकसित यह किस्म 120 दिनों में पकती है। इसकी पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस नई किस्म की प्रायोगिक खेती चल रही है।
 2. प्रभात यह किस्म 115 से 135 दिनों में पकती है। इसकी ऊंचाई 150-170 सें.मी. होती है। उपज 10-12 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है।
3. आईसीपीए-87(प्रगति) यह बौनी किस्म 130 से 140 दिनों में पकती है तथा उकठा रोग प्रतिरोधी है। इसके दाने बड़े व हल्के भूरे रंग के होते हैं। अधिक तापमान व सूखा सहन करने वाली इस किस्म से 18 से 20 क्विटंल प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है।
4. यूपीएएस-120 यह किस्म 120 से 125 दिनों में पककर तैयार होती है। हल्के भूरे रंग के बीज वाली इस किस्म के 1000 बीजों का भार 67 ग्राम होता है।
5. मानक (एच-77-216) यह किस्म 130-135 दिनों में पकती है। अधिक तापमान व सूखा सहन करने वाली इस किस्म से 18 से 20 क्विटंल प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है।
6. लक्ष्मी (आईसीपीएल-85063) यह किस्म बुआई के 120-130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
7. अन्य पूसा-33 पूसा-855, पूसा-991, पूसा-992, पूसा-2001, पूसा-2002, टाईप-21, शारदा-पारस आदि उपयुक्त किस्में है।

वर्षा आधारित फसल के लिए जुलाई के मध्य तक वर्षा होते ही बुआई कर देते हैं। फसल के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 से 75 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सें.मी. रखी जानी चाहिए। हल के पीछे पोरा लगाकार बुआई करते हैं। ध्यान रहे कि बीज 5 सें.मी. से अधिक गहरा न बोया जाए। लेग्यूमिनेसी कुल की फसल होने से अरहर की फसल में भी नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता नहीं होती। मृदा परीक्षण के आधार पर फॉस्फोरस व पोटाश भी आवश्यकतानुसार दी जानी चाहिए। पौधों के प्रारम्भिक विकास के लिए 18 से 20 कि.ग्रा नाइट्रोजन, 40 से 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 30 कि.ग्रा पोटाश की जरूरत रहती है। अधिक वर्षा होने पर इस फसल में खरपतवार बहुत तेजी से ब विधि से नष्ट करने के लिए पेन्डीमिथाइलिन 30 ई.सी. की 1.5 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद व अंकुरण से पहले प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। फ्लोक्लोरेलिन (बेसालिन) की 1 कि.ग्रा मात्राा बुआई से पूर्व प्रति हेक्टेयर मृदा में भलीभांति लानी चाहिए।

अरहर के फसल अवशेष से मृदा स्वास्थ्य में सुधार

  • अरहर की पत्तियों के लिये उपयोग किये गये पौधों को जब जमीन में हल चलाकर दबाया जाता है तो उनके गलने-सड़ने से जड़ों की गांठों में जमा नाइट्रोजन जैविक रूप में मृदा में पुनः आकर लेकर उसकी-उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है।
  • अरहर की पत्तियों से मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। लगभग 40-50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन अगली फसल को प्राप्त होती है।
  • मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ने से सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधियां बढ़ती हैं। इससे पोषक तत्वों की उपलब्धता में बढ़ोतरी होती है।
  • अरहर की पत्तियों को मृदा में मिलाने से मृदा की भौतिक स्थिति में सुधार होता है और मृदा में जल धारण की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • मृदा की संरचना में सुधार होने के कारण फसल की जड़ों का फैलाव अच्छा होता है।

अरहर परिपक्वता के समय अर्थात जब पौधे की सभी फलियों में दाने भर जाएं और पत्तियां हल्की पीली हो जाएं तो 10 प्रतिशत यूरिया (एक लीटर पानी में 100 ग्राम) का घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़काव करने से एक सप्ताह में अधिकांश पत्तियां खेत में ही गिर जाती हैं। इस प्रकार खेत में 1.2-1.4 टन प्रति हैक्टर पत्तियों के अवशेष/बायोमास समावेश होते हैं। ये अवशेष अन्य फसल के अवशेषों की तुलना में जल्दी विघटित होकर खाद का काम करते हैं। कम्पोस्टिंग के बाद अगली फसल के लिए 0.5 टन प्रति हेक्टेयर जैविक खाद की पूर्ति होती है। हरी पत्तियों में लगभग 4 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है, जो अगली फसल की लगभग 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की पूर्ति करती है। इस प्रकार अगली गेहूँ की फसल में 10-20 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है।

सारणी-2 के अनुसार एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन से तीन वर्षों में अरहर की औसतन उपज में संस्तुत एनपीके की तुलना में 600 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बढ़ोतरी हुई है और गेहूं की उपज में 950 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई।

सारणी 2. अरहर-गेहूं फसल प्रणाली की उपज, उत्पादकता एवं शुद्ध लाभ

प्रदर्शन प्लॉट औसतन उपज में वृद्धि (क्विं./है.) कुल मुनाफा (हजार/हैक्टर)
  अरहर गेहूँ अरहर उपज गेहूं उपज प्रणाली उत्पादकता
बिना उर्वरक 0.94 2.21 7.6 0.6 8.2
संस्तुत एनपीके 1.44 4.28 13.5 17.2 30.7
केवल खाद 1.15 3.02 3.3 1.6 4.9
एनपीके+खाद 1.79 4.92 11.3 13.5 24.8
एनपीके+पत्तियां खाद 1.50 5.23 13.5 18.9 32.4

यदि किसान इस तकनीकी को अपनाते हैं तो उपज में बढ़ोतरी के साथ खाद एवं उर्वरक का खर्चा भी कम होता है। किसान को 30 से 40 प्रतिशत का लाभ भी अधिक होगा। किसान, अरहर की पत्तियों को खेत में गिराकर मृदा स्वास्थ्य में अत्यधिक सुधार कर सकते हैं। स्वस्थ धरा तो खेत हरा का सपना साकार हो सकता है।ccMK3

वर्तमान में भूमिगत जल स्तर की लगातार गिरावट के साथ जल की लवणता भी बढ़ रही है। धान की फसल में अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है। धान की पुआल को जलाने की समस्या को देखते हुए मृदा सुधार के लिए किसानों के लिए यह तकनीकी अपनाना अति आवश्यक है। अरहर की अतिरिक्त कम अवधि (ईएसडी) वाली किस्मों को उगाकर गेहूँ की देरी से बुआई के प्रतिकूल प्रभाव को भी दूर कर सकते हैं। साथ ही, जिन क्षेत्रों में पानी की कमी की स्थितियां हैं, वहां यह प्रोटीन-ऊर्जा-कुपोषण (पीईएम) से निपटने में भी वरदान सिद्ध होगी।

स्त्रोत : खेती पत्रिका,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),लेखक:गोरधन गेना, महेशचन्द मीना और अशोक कुमार मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान संभाग भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012

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