ईसबगोल की उन्नत उत्पादन तकनीक

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ईसबगोल की उन्नत उत्पादन तकनीक

ईसबगोल की उन्नत उत्पादन तकनीक

 

इसबगोल का पौधा : ईसबगोल की खेती के बारे में जाने पूरी जानकारी

आजकल औषधीय खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है। जागरूक किसान अपनी आय बढ़ाने के लिए पारंपरिक खेती से मुंह मोड़ रहे हैं और अधिक मुनाफे वाली खेती करने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। जो किसान अभी तक पिछड़े हुए हैं उनको भी पारंपरिक खेती का मोह छोड़ कर औषधीय खेती करनी चाहिए। यहां बात करते हैं ईसबगोल की खेती की। किसानों की जानकारी के लिए बता दें कि कम समय में तैयार होने वाली ईसबगोल की फसल किसानों को मालामाल कर सकती  है। ईसबगोल एक औषधीय प्रजाति का पौधा है। देखने में यह पौधा झाड़ी के समान लगता है। फसल के रूप में इसमें गेहूं जैसी बालियां लगती हैं। ईसबगोल की भूसी में अपने वजन की कई गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है।copy5 of 1

ईसबगोल Plantago ovata Forsk. एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय फसल है।औषधीय फसलों के निर्यात में इसका प्रथम स्थान हैं। वर्तमान में हमारे देश से प्रतिवर्ष 120 करोड के मूल्य का ईसबगोल निर्यात हो रहा है। विश्व में ईसबगोल का सबसे बडा उपभोक्ता अमेरिका है। विश्व में इसके प्रमुख उत्पादक देश ईरान, ईराक, अरब अमीरात, भारत, फिलीपीन्स इत्यादि हैं। भारत का स्थान ईसबगोल उत्पादन एवं क्षेत्रफल में प्रथम है। भारत में इसका उत्पादन प्रमुख रूप से गुजरात ,राजस्थान ,पंजाब , हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में करीब 50 हजार हेक्टर में हो रहा हैं। म. प्र. में नीमच, रतलाम, मंदसौर, उज्जैन एवं शाजापुर जिले प्रमुख है।

उपयोग
ईसबगोल का औषधीय उपयोग अधिक होने के कारण विश्व बाजार में इसकी मांग तेजी से बड रही हैं। ईसबगोल के बीज पर पाएं जाने वाला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद हैं जिसे ईसबगोल की भूसी के नाम से जाना जाता हैं। भूसी और बीज का अनुपात 25:75 रहता है।इसकी भूसी में पानी सोखने की क्षमता अधिक होती हैं ।इसलिए इसका उपयोग पेट की सफाई , कब्जीयत, दस्त आव पेचिस , अल्सर, बवासीर , जैसी शारीरिक बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता हैं।इसके अलावा आइसक्रीम रंग रोगन , प्रिंटिंग आदि उद्योगों में भी इसका उपयोग किया जाता हैं ।इसकी मांग एवं उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करना आवश्यक हैं ।
भूमि एवं जलवायु –
ईसबगोल के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त हैं।फसल पकते समय वर्षा व ओस का होना फसल के लिए बहुत ही हानिकारक होता हैं । कभी कभी फसल 100 प्रतिशत तक नष्ट हो जाती हैं। अधिक आद्रता एवं नमीयुक्त जलवायु में इसकी खेती नहीं करना चाहिए । इसके अंकुरण के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियस तथा फसल की परिपक्वता के समय 30-35 डिग्री सेल्सियस तापक्रम उपयुक्त हैं। इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि उपयुक्त हैं। भूमि की पी-एच मान 7-8 तक होना चाहिए।
भूमि की तैयारी –
दो बार आडी खडी जुताई एवं एक बार बखर चलावें तथा पाटा चलाकर मिटटी भुरभुरी एवं समतल कर लेवें। छोटी क्यारियां बना लें। क्यारियों की लम्बाई चैडाई खेत के ढलान एवं सिंचाई की सुविधानुसार रखें।  क्यारियों की लम्बाई 8-12 मीटर व चैडाई 3 मीटर से अधिक रखना उचित नहीं होता हैं। खेत में जल निकास का प्रबंध अच्छा होना चाहिए। क्योंकि खेत में पानी का भराव ईसबगोल के पौधे सहन नहीं कर सकते हैं।

ईसबगोल की उन्नत खेती के लिए उम्दा किस्मों का करें चयन / इसबगोल का पौधा ऐसे चुनें

ईसबगोल की खेती करने के इच्छुक किसान भाइयों को चाहिए कि वे अपने क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के आधार पर ईसबगोल की किस्मों का चुनाव करें। इससे उनको प्रति हेक्टेयर उत्पादन वृद्धि का लाभ मिल सकेगा। यहां ईसबगोल की उन्नत किस्मों के बारे में उपयोगी जानकारी दी जा रही है जो इस प्रकार है-:

  • आर.आई. 89 ईसबगोल : ईसबगोल की अन्य बढिय़ा किस्म आर.आई. 89: है। यह राजस्थान के शुष्क एवं अद्र्ध शुष्क क्षेत्रों के लिए विकसित की गई किस्म है।  इसमें फसल तैयार होने की अवधि 110 से 115 दिन होती है। इसकी उपज क्षमता 4.5 से 6.5 क्विंटल प्रति एकड़ है। यह किस्म रोगों और कीटों के आक्रमण से कम प्रभावित होती है। इसके साथ ही उच्च  गुणवत्ता वाली होती है।
  • आर.आई.1 ईसबगोल : ईसबगोल की आर.आई. 1: किस्म भी राजस्थान में अधिक बोई जाती है। इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 29 सेमी से 47 सेंटीमीटर होती है। यह किस्म 112 से 123 दिन में पक जाती है। वहीं उपज क्षमता 4.5 से 8.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

जवाहर ईसबगोल 4 – यह प्रजाति 1996 में औषधीय एवं सुगन्धित पौध की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कैलाश नाथ काटजू उद्यानिकी महाविघालय ,मंदसौर (राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय,ग्वालियर) द्वारा म.प्र. के लिए अनुमोदित एवं जारी की गई है। इसका उत्पादन 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता है।

गुजरात ईसबगोल 2 – यह प्रजाति 1983 में अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, आणंद, गुजरात से विकसित की गई हैं।  ईसबगोल की यह किस्म गुजरात क्षेत्र के लिए उपयुक्त और बढिया मानी जाती है। यह  किस्म 118 से 125 दिन में पकती है। वहीं इसकी पैदावार प्रति एकड़ के हिसाब से 5 से 6 क्विंटल होती है।  इसमें भूसी की मात्रा 28 से 30 प्रतिशत तक पाई जाती है।

हरियाणा ईसबगोल 5 – यह प्रजाति अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा 1989 में निकाली गई हैं। इसका उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता हैं।

अन्य किस्मों में गुजरात ईसबगोल 1, हरियाणा ईसबगोल – 2, निहारिका, ट्राबे सलेक्शन 1 से 10 आदि का चयन कर बुवाई की जा सकती है।

ईसबगोल की बुआई का सही समय 

ईसबगोल की अगेती बोआई करने पर फसल की ज्यादा वानस्पतिक वृद्धि हो जाती हैं परिणामस्वरुप फसल आडी पड जाती हैं तथा मदुरोमिल आसिता का प्रकोप बढ जाता हैं। वही पर देरी से बुवाई करने पर प्रकोप का वानस्पतिक विकास कम होता हैं और मानसून पूर्व की वर्षा से बीज झडने का अंदेशा बना रहता हैं। इसलिए किसान भाई ईसबगोल की बोआई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के द्वितीय सप्ताह तक करते हैं तो यह अच्छा समय होता हैं। दिसम्बर माह तक बोआई करने पर उपज में भारी कमी आ जाती हैं।ईसबगोल की खेती के लिए किसानों को सही समय का ज्ञान होना चाहिए। बता दें कि ईसबगोल की बुआई अक्टूबर से नवंबर माह के बीच होनी चाहिए। इसके बीजों की बुआई कतारों में की जाती है। इनकी कतार से कतार की दूरी 25 से 30 सेंटीमीटर होना जरूरी है। बीज को करीब 3 ग्राम थाईरम प्रति किलोग्राम के हिसाब से उपचारित कर लें और मिट्टी में मिला लें। इसके बाद ही बुआई की जानी चाहिए।
बीज की मात्रा –
बडे आकार का, रोग रहित बीज की 4 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टर की दर से उपयोग लेने पर फसल का अच्छा उत्पादन लिया जा सकता हैं। बीज दर ज्यादा होने की दशा में मदुरोमिल आसिता का प्रकोप बढ जाता हैं व उत्पादन प्रभावित हो जाता है।
बीजोपचार –
ईसबगोल के बीज को मैटालैक्जिल 35 एस. डी. की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज के मान से बीजोपचार कर बुवाई करें। किसान भाई मृदा उपचार हेतु जैविक फफंदी नाशक ट्राइकोडर्मा विरिडी की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टर की दर से अच्छी पकी हुई गोबर की खाद अथवा वर्मीकम्पोस में मिला कर नमी युक्त खेत में प्रयोग करें।
बोने की विधि
किसानों में ईसबगोल की छिटकाव पद्धति से बुवाई करना प्रचलित हैं। परंतु इस विधि से अंतःसस्य किय्राएं करने में कठिनाई आती हैं। परिणामस्वरुप उत्पादन प्रभावित हो जाता है। अतः किसान भाई ईसबगोल की बुवाई कतारों में करते हुए कतार से कतार की दूरी 30 से. मी. एवं पौधे की दूरी 5 से. मी. रखे । बुवाई करते समय बीज में महीन बालू रेत अथवा छनी हुई गोबर की खाद मिलाकर बुवाई करें जिससे वंाछित बीज दर का प्रयोग हो सके। बीज की गहराई 2-3 से.मी. रखे। इससे ज्यादा गहरा बीज न बोयें । छिटकाव पद्धति से बोने पर मिट्टी में ज्यादा गहरा न मिलावें।
खाद एवं उर्वरक :-
ईसबगोल का अच्छा उत्पादन हेतु अच्छी पकी हुई गोबर की खाद 15-20 टन प्रति हेक्टर डालें। 10-15 किलो नत्रजन , 40 किलो स्फुर एवं 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टर बुवाई के समय डालें। नत्रजन की 10-15 किलो प्रति हेक्टर बुवाई के 40 दिन बाद छिटकाव कर डालें।

ईसबगोल की खेती (Isabgol ki kheti) : रोग और कीटों से बचाव की जानकारी

  • यहां बता दें कि ईसबगोल की फसल में कई प्रकार के रोगों को प्रकोप होता है। यदि समय रहते इन रोग और कीटों के लिए उचित निवारण नहीं किया जाए तो फसल को काफी नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। ईसबगोल की फसल में रोग और कीटों का प्रकोप होने और इनके निवारण की जानकारी  यहां दी जा रही है।
  • ईसबगोल को तुलासिता नामक रोग से बचाने के लिए फसल की कम से कम 30 सेमी की दूरी पर बुआई करनी चाहिए।
  • अगर हो सके तो कतारें पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व दिशा में निकालें। अन्य दिशाओं में कतारें निकालने से रोग का प्रकोप अधिक होता है।
  • फसल के सही पकने के लिए आवश्यक है कि जमीन शुष्क रहे, पकाव के समय बारिश होने से बीज झड़ जाते हैं और छिलका फूल जाता है।
  • ईसबगोल की फसल में उर्वरक की बात करें तो प्रति एकड़ 12 किलो नत्रजन और 10 किलो फास्फोरस की जरूरत होती है ताकि फसल जल्दी बढ़ कर अधिक उत्पादन दे सके।
  • फसल में 60 दिन बाद बालियां निकलना शुरू होती है और करीब 115 से 130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। फसल कटाई के दौरान मौसम साफ होना चाहिए।
  • तुलासिता के अलावा ईसबगोल का दूसरा रोग है उकठा या विल्ट। इस रोग से प्रभावित पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। इस रोग से बचाव के लिए 2 ग्राम कार्बेडाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी प्रति किलो बीज की दर से बीजों को उपचारित करना चाहिए।
  • इसी तरत यदि दीमक का प्रकोप है तो इसके नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरिफॉस 25 ईसी 2.47 लीटर पानी से सिंचाई कर जमीन में दें।
सिंचाई :-
अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई धीमी गति से करें। अंकुरण कमज़ोर होने पर दूसरी सिंचाई 5-6 दिन बाद देवें । इसके बाद प्रथम सिंचाई 30 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई 70 दिन बाद देवें। फूल एवं दाना भरने की अवस्था पर सिंचाई न दें। इनमें दो से ज्यादा सिंचाई देने पर रोगों का प्रकोप बढ जाता हैं तथा उपज में कमी आ जाती हैं। पुश्पक्रम / बाली आने के बाद स्प्रिकंलर से सिचाई ना करें ।
निंदाई-गुडाई :-
बुवाई के 20-25 दिन बाद एक बार निंदाई-गुडाई अवश्य करें । इसी समय छनाई का काम भी कर देवें तथा पौधों की दूरी 5 से.मी. रखें । इस फसल में रासायनिक नींदा नियंत्रण के लिए सल्फोसल्फुरोन की 25 ग्राम मात्रा अथवा आइसोप्रोटूरोंन  की 500-750 ग्राम सक्रिय तत्व की मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर बोनी के 20 दिन पर छिडकाव करें।
पौध संरक्षण :-
डाउनी मिल्ड्यू (मदुरोमिल आसिता)-मृदुल रोमिल आसिता के लक्षण पौधों में बाली (स्पाइक) निकलते समय दिखाई देते हैं। सर्वप्रथम पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद या कत्थई रंग के धब्बे दिखाई देते हैं तथा पत्ती के निचले भाग में सफेद चूर्ण जैसा कवक जाल दिखाई देता हैं। बाद में पत्तियां सिकुड जाती हैं तथा पौधों की बढवार रुक जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप डंठल की लम्बाई , बीज बनना एवं बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती हैं। रोग नियंत्रण हेतु स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोयें , बीजोपचार करें एवं कटाई के बाद फसल अवशेषों को जला देवें। प्रथम छिडकाव रोग का प्रकोप होने पर मैटालैक्जिल $ मैंकोजेब की 2-2.5 ग्राम मात्रा अथवा कापर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें। छिडकाव 10-15 दिन के अंतराल पर दोहराए।

मोयला – माहू का प्रकोप सामान्यतः बुवाई के 60-70 दिन की अवस्था पर होता है।यह सुक्ष्म आकार का कीट पत्तियों, तना एवं बालियों से रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है। अधिक प्रकोप होने की दषा में पूरा पौधा मधु स्त्राव से चिपचिपा हो जाता हैं तथा फसल पर क क्रिया बाधित हो जाती हैं जिससे उत्पादन प्रभावित होता हैं। इसकी रोकथाम हेतु आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली/ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आव यकतानुसार छिडकाव को दोहराए ।

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ईसबगोल की अधिक उपज के लिए क्या करें

  1. समय पर बोनी करें ।
  2. बीज की गहराई 2-3 सेमी से ज्यादा न रखें।
  3. बीजोपचार अवश्य करें ।
  4. उन्नत बीज का उपयोग करें ।
  5. पौधों की छनाई 20-25 दिन बाद अवश्य करें।
  6. क्रांतिक अवस्थाओं पर दो सिंचाई से ज्यादा न करें।
  7. डाउनी मिल्ड्यू रोग का उपचार फफूंदनाशक से अवश्य करें।
  8. रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देवें।
  9. मोयला का नियंत्रण समय पर अवश्य करें ।
  10. खरपतवार नियंत्रण समय पर करें ।
  11. कटाई उपयुक्त अवस्था में करें ।
  12. मावठा/बरसात को ध्यान में रखते हुए कटाई 2-3 दिन जल्दी कर लेवें ।
  13. फसल की गहाई सुबह के समय खेत में ही करें।

फसल की कटाई :- फसल 110-120 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं , फसल पकने पर पौधों की ऊपरी पत्तियां पीली एवं नीचे की पत्तियां सूख जाती हैं। बालियों को हथेली में मसलने पर दाने आसानी से निकल जाते हैं। इसी अवस्था पर फसल की कटाई करें। कटाई सुबह के समय करने पर झडने की समस्या से बचा जा सकता हैं। फसल कटाई देर से न करें अन्यथा दाने झडने से उपज में बहुत कमी आ जाती हैं। मावठा आने की स्थिति में फसल कटाई 2-3 दिन जल्दी कर लेवें।
उपज:-
उन्नत तकनीक से खेती करने पर 15-16 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज मिल जाती हैं ।
ईसबगोल की अधिक उपज के लिए क्या करें :-
1 समय पर बोनी करें ।

2 बीज की गहराई 2-3 सेमी से ज्यादा न रखें।

3 बीजोपचार अवश्य करें ।

4 उन्नत बीज का उपयोग करें ।

5 पौधों की छनाई 20 – 25 दिन बाद अवश्य करें।

6 क्रांतिक अवस्थाओं पर दो सिंचाई से ज्यादा न करें।

7 डाउनी मिल्ड्यू रोग का उपचार फफूंदनाशक से अवश्य करें।

8 रोगग्रस्त पौधों को उखाड कर नष्ट कर देवें।

9 मोयला का नियंत्रण समय पर अवश्य करें ।

10 खरपतवार नियंत्रण समय पर करें ।

11 कटाई उपयुक्त अवस्था में करें ।

12 मावठा / बरसात को ध्यान में रखते हुए कटाई 2-3 दिन जल्दी कर लेवें ।

13 फसल की गहाई सुबह के समय खेत में ही करें।

ईसबगोल की खेती का आर्थिक विश्लेषण

क्र.  विवरण मात्रा एवं दर प्रति इकाई लागत (रु)
1. भूमि की तैयारी
जुताई की संख्या – 03 / 400रु/घंटा, 2 घंटा /हेक्टर 2400
2. खाद और उर्वरक 4.7
उर्वरक गोबरकी खाद 10 टन/हे./ 400रु/टन 4000
नत्रजन 30 * 12.5 375
फॉस्फोरस 40 * 32.5  1300
पोटाश 20 * 20 400
मजदूरों की संख्या 2 पर 250रु/मजदूर   500
3. बीज एवं बुआई
बीज की मात्रा  5 किग्रा / 150 रु/किग्रा 750
बीज उपचार
मैटालैक्जील 5 ग्राम/किग्रा  50
राइजोबियम 50 ग्राम/किग्रा  10
पी.एस.बी. 50 ग्राम/किग्रा 10
बुआई का खर्च 2 घंटा /हेक्टर / 400रु/ घंटा 800
मजदूरों की संख्या 4 पर 250रु/मजदूर 1000
4. निंदाई/खरपतवार
 आइसोप्रोटूरोंन 750ग्राम  975
निंदाई – मजदूरी 25 / 200 रु/  मजदूर 5000
5. फसल सुरक्षा
डाइमिथोएट (2 बार) 750 मिली/हेक्टर (1.5 लीटर) 525
मैटालैक्जील $ मैंकोजेब 1 किग्रा 900
6. सिंचाई
मजदूरों की संख्या  3 सिंचाई / 750रु/ मजदूर  2250
विद्युत खर्च  100 रु/हेक्टर 300
7.  कटाई
मजदूरों की संख्या  20 मजदूर / 200रु/ मजदूर 4000
 मडाई 650रु/घंटा, 4 घंटा /हेक्टर 2600
8. कुल खर्च  28145
9. उपज  15 क्विंटल / हेक्टर / 8000 रु/ किग्रा 120000
10. शुद्ध लाभ 91855
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