चना उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक

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चना उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक

Improved cultivation techniques of Chickpea

प्रमुख दलहन

चना रबी ऋतु ने उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है। विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। चने में 21 प्रतिशत प्रोटीनए 61.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 4.5 प्रतिशत वसा होती है। इसमें कैल्शियम आयरन व नियासीन की अच्छी मात्रा होती है। चने का उपयोग इसके दाने व दाने से बनायी गयी दाल के रुप में खाने के लिये किया जाता है। इसके दानों को पीसकर बेसन बनाया जाता है, जिससे अनेक प्रकार के व्यंजन व मिठाईयां बनायी जाती हैं। हरी अवस्था में चने के दानों व पौधों का उपयोग सब्जी के रुप में किया जाता है। चने का भूसा चारे व दाना पशुओं के लिए पोषक आहार के रूप मे प्रयोग किया जाता है। चने का उपयोग औषधि के रूप में जैसे खून साफ करने के लिए व अन्य बीमारियों के लिए भी किया जाता है। चना दलहनी फसल होने के कारण वातावरण से नाइट्रोजन एकत्र कर भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाता है।

राज्यवार उत्पादन

देश में कुल उगायी जाने वाली दलहन फसलों का उत्पादन लगभग 17.00 मिलियन टन प्रति वर्ष होता है। चने का उत्पादन कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है। देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। जो कुल चने उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा करता है। इसके पश्चात्‌ आन्ध्र प्रदेश (15.4प्रतिशत), राजस्थान (9.7प्रतिशत), कर्नाटक (9.6प्रतिशत) तथा उत्तर प्रदेश (6.4प्रतिशत) का स्थान आता है। राज्य में चने की औसत उपज (700 कि.ग्रा.प्रति हैक्टेयर) अन्य राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश (1440कि.ग्रा.), गुजरात (970कि.ग्रा.), कनार्टक (930कि.ग्रा.) व महाराष्ट्र (870कि.ग्रा.) की अपेक्षा काफी कम है। राज्य में चने की औसत उपज कम होने के अन्य कारणों के अतिरिक्त पारम्परिक विधियों द्वारा खेती करना भी प्रमुख कारण हैं। चने की खेती उन्नत विधियों द्वारा करने पर इसकी औसत उपज में दोगुनी से अधिक बढ़ोत्तरी की जा सकती है।

उन्नत किस्मों का प्रयोग

चने की फसल से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए उपयुक्त किस्मों का चुनाव बहुत ही आवश्यक है। चने की अनेक उन्नत किस्में विकसित की गई हैं।

भूमि एवं उसकी तैयारी

चने की खेती के लिए हल्की दोमट या दोमट मिट्‌टी अच्छी होती है। भूमि में जल निकास की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिये। भूमि में अधिक क्षारीयता नहीं होनी चाहिये। प्रथम जुताई मिट्‌टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करनी चाहिये। इसके पश्चात्‌ एक क्रास जुताई हैरों से करके पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिये। फसल को दीमक एवं कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए अन्तिम जुताई के समय हैप्टाक्लोर (4 प्रतिशत) या क्यूंनालफॉस (1.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) या एन्डोसल्फॉन की (1.5 प्रतिशत) चूर्ण की 25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्‌टी में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिये।

चना रबी ऋतु ने उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है। विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। देश के कुल चना क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत भाग तथा कुल उत्पादन का लगभग 92 प्रतिशत इन्ही प्रदेश से प्राप्त होता है। भारत में चने की खेती 7.54 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जिससे 7.62 क्विं./हे. के औसत मान से 5.75 मिलियन टन उपज प्राप्त होती है।

भारत में चने की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा बिहार में की जाती है। भारत में सबसे अधिक चने का क्षेत्रफल एवं उत्पादन वाला राज्य मध्यप्रदेश है तथा छत्तीसगढ़ प्रान्त के मैदानी जिलो में चने की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है। चने में 21 प्रतिशत प्रोटीन 61.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 4.5 प्रतिशत वसा होती है।

चने में कैल्शियम एवं आयरन की अच्छी मात्रा होती है। इसका उपयोग इसके दाने (Seed) व दाने से बनायी गयी दाल के रुप में खाने के काम मे लिये जाता है। इनके दानों को पीसकर बेसन बनाया जाता है, जिससे अनेक प्रकार के व्यंजन व मिठाईयां (जैसे- लड्डू, नमकीन, पापड़, पकोड़े आदि) बनायी जाती हैं ओर हरी अवस्था में चने के दानों व पौधों की कच्ची कोमल पत्तियों का प्रयोग सब्जी के रुप में किया जाता है।

चने का भूसा चारे व दाना पशुओं के लिए पोषक आहार के रूप मे प्रयोग किया जाता है। चने का उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है।

चनेे की किस्में:

जी एन जी 1581 (गणगौर) 

यह देसी चना की किस्म है। किस्म यह समय पर बुवाई एवं सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके पौधे अर्ध खड़े, मध्यम ऊंचाई वाले बहु द्वितीयक शाखित होते है। इसके दानों का रंग हल्का पीला होता है। इसके 100 दानो का भार लगभग 16 ग्राम होता है।

यह किस्म उखटा एवं जड़गलन आदि के प्रतिरोधी है। यह किस्म लगभग 151 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसके दानों में 23 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पायी जाती है। इस किस्म की औसत उपज 23 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।

जी एन जी 1488 (संगम) –

यह देसी चना की किस्म है। यह देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त है। इसके दानों का रंग भूरा होता है तथा दानो की सतह चिकनी होती है। इसके 100 दानो का भार लगभग 15.8 ग्राम होता है। यह किस्म झुलसा, जड़गलन एवं फली छेदक आदि के प्रतिरोधी है।

 

किस्म लगभग 130 -135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।

जी एन जी 146 –

पौधे मध्यम ऊंचे और अर्द्ध खड़े होते है। पौधों का रंग घूसर हरा और मध्यम आकार का होता है। फूल गुलाबी रंग के होते हैं। इसके 1000 दानों का भार लगभग 140 ग्राम होता है। यह किस्म 145 से 150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। यह झुलसा रोग के प्रति काफी हद तक रौधी हैं। यह चने की किस्म 24 से 26 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक पैदावार दे सकती है।

जी एन जी 663 (वरदान) –

यह किस्म 145 से 150 दिनों में पककर तैयार होती है और इसकी पैदावार 20 से 24 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है। इस किस्म के दाने भूरे गुलाबी रंग के और फुल बैंगनी गुलाबी रंग के होते हैं। इसके 1000 दानों का भार लगभग 150 ग्राम होता है। यह किस्म झुलसा रोग के प्रति काफ हद तक रोधी हैं।

 

आर एस जी 888 –

यह चने की किस्म 141 दिन में पककर तैयार हो जाती है और इसकी पैदावार 20 से 24 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। यह किस्म विल्ट के प्रति मध्यम प्रतिरोधक है।

बी जी 256 –

बारानी एवं सिंचित क्षेत्रों के लिये उपयुक्त इस चने की किस्म के पौधे अर्धविस्तारी और पत्तियां चैड़ी एवं दाने आकर्षक बड़े तथा हल्के रंग के होते है। यह किस्म विल्ट व झुलसा के प्रति मध्यम रोग रोधी है। 130 से 140 दिन में पककर यह असिंचित क्षेत्रों में 12 से 15 क्विंटल और सिंचित क्षेत्रों में 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती हैद्य इसके 100 दानों का वजन 26 से 28 ग्राम होता है।

देशी प्रजातियाँ: समय से बुआई

प्रजातियाँ/मुख्य किस्में

चने की किस्मों की मुख्य विशेषताएं

गुजरात चना–4

जारी वर्ष – 2000

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 120-130 दिन होती है,  पौधा मध्यम बड़ा उकठा अवरोधी सिंचित एवं असिंचित दशा के लिए उपयुक्त होता है |
अवरोधी

जारी वर्ष–1987

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 145-150 दिन होती है,  पौधे मध्यम ऊँचाई (सेमी इरेक्ट) भूरें रंग के दाने व उकठा अवरोधी होता है |
पूसा – 256

जारी वर्ष–1985

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-140 दिन होती है,  पौधे की ऊँचाई मध्यम, पत्ती चौड़ी, दाने का रंग भूरा एवं एस्कोकाइटा ब्लाइट बीमारियों के प्रति सहिष्णु होता है |
के.डब्लू.आर.–108

जारी वर्ष – 1996

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-135 दिन होती है, दाने का रंग भूरा, पौधे मध्यम ऊँचाई, उकठा अवरोधी होता है |
राधे

जारी वर्ष – 1968

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 140-150 दिन होती है,  इसका दाना बड़ा होता है |
जे.जी. – 16

जारी वर्ष – 2000

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-140 दिन होती है,  उकठा अवरोधी बुन्देलखण्ड हेतु |
के. – 850

जारी वर्ष – 1978

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 145-150 दिन होती है, इसका दाना बड़ा, उकठा ग्रसित होता है |
डी.सी.पी. – 92-3

जारी वर्ष – 1998

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 145-150 दिन होती है,  उकठा अवरोधी, छोटा पीला दाना होता है |
आधार (आर.एस.जी. – 963)

जारी वर्ष – 2005

उत्पादकता 19-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 125-130 दिन होती है,  उकठा, अवरोधी होता है |
डब्लू.सी.जी. – 1

जारी वर्ष – 1996

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-145 दिन होती है, इसका दाना बड़ा होता है |
डब्लू.सी.जी. – 2

जारी वर्ष – 1999

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-135 दिन होती है, इसके छोटे दाने वाली उकठा प्रतिरोधी होते है |
के.जी.डी. -1168 (आलोक)

जारी वर्ष – 1997

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 150-155 दिन होती है,  यह उकठा अवरोधी होता है |
जी.एन.जी. – 1958 (मरुधर)

जारी वर्ष – 2013

उत्पादकता 26-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 140-145 दिन होती है, उकठा, जड सडन, ग्रीवा गलन अवरोधी होता है |
जे.जी. – 14

जारी वर्ष – 2009

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 110-115 दिन होती है, उकठा, सूख गलन, फली बेधक अवरोधी |
जी.एन.जी. – 1581 (गणगौर)

जारी वर्ष – 2008

उत्पादकता 22-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 127-177 दिन होती है, लाँजिंग अवरोधी |
बी.जी. – 3043

जारी वर्ष – 2018

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-140 दिन होती है,  देशी प्रजाति, मध्यम आकार होता है |
जी.एन.जी. – 2171

जारी वर्ष – 2017

उत्पादकता 20.14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 163 दिन होती है, देशी प्रजाति, पीला दाना, फ्यूजेरियम विल्ट सहिष्णु |
पन्त ग्राम – 5

जारी वर्ष – 2017

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 125-130 दिन होती है,  भूरा दाना, फ्यूजेरियम विल्ट सहिष्णु |
सी.एस.जे. – 515 (अमन)

जारी वर्ष – 2016

उत्पादकता 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135 दिन होती है, (उ.प्र. मैदानी क्षेत्र के लिए) छोटा भूरा दाना, सूखा जड सडन, विल्ट, कालर राँट मध्यम अवरोधी, एस्कोचाइटा ब्लाइट एवं बी.जी.एम. सहिष्णु |
पूसा – 3022 (बी.जी.3022)

जारी वर्ष – 2015

उत्पादकता 16-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-140 दिन होती है, बड़े एवं आकर्षक दाना, काबुली प्रजाति |
वल्लभ काबुली चना – 1

जारी वर्ष – 2015

उत्पादकता 23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 147 दिन होती है,  स्लेटी कलरयुक्त बड़ा दाना, फ्यूजेरियम विल्ट मध्यम अवरोधी |
जी.एन.जी. – 1969 (के.)

जारी वर्ष – 2013

उत्पादकता 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 146 दिन होती है, क्रीमी बैगनी रंग का दाना |
जी.एल.के. – 28127

जारी वर्ष – 2013

उत्पादकता 21 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 149 दिन होती है,  हल्का पीला एवं क्रीम रंग का बड़ा दाना होता है |
जाकी – 9218

जारी वर्ष – 2008

उत्पादकता 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 93-125 दिन होती है, विल्ट, रूट राँट एवं कालर राँट अवरोधी होता है |
शुब्रा (आई.पी.सी.के. – 2004–29)

जारी वर्ष – 2009

उत्पादकता 21 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 104–108 दिन होती है, विल्ट मध्यम अवरोधी तथा सुखा एवं उच्च ताप सहनशील होता है |

देर से बुआई के लिए उपयुक्त किस्में

पूसा – 372

जारी वर्ष – 1993

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-140 दिन होती है,  उकठा, ब्लाइट एवं जड गलन के प्रति सहिष्णु होता है |
उदय

जारी वर्ष – 1992

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-140 दिन होती है, दाने का रंग भूरा, मध्यम ऊँचाई होता है |
पन्त जी. – 186

जारी वर्ष – 1996

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 120-130 दिन होती है,  पौधे मध्यम ऊँचाई, उकठा सहिष्णु होता है |
आई.सी.पी

जारी वर्ष – 2006 – 77

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 130-135 दिन होती है,  उकठा रोग रोधी, दाना मध्यम आकार का होता है |
जी.एन.जी. – 2207 (अवध)

जारी वर्ष – 2018

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-140 दिन होती है,
जी.एन.जी. – 2144  (तीज)

जारी वर्ष – 2016

उत्पादकता 22.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 133 दिन होती है, देशी प्रजाति, मध्यम आकार एवं फ्यूजेरियम विल्ट सहिष्णु |
राज विजय चना – 202 (आर.वी.जी.–202)

जारी वर्ष – 2015

उत्पादकता 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 102 दिन होती है, काबुली प्रजाति, ड्राई रुट राँट एवं कालर राट मध्यम अवरोधी |
राज विजय चना – 203 (आर.वी.जी.–203)

जारी वर्ष – 2012

उत्पादकता 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 100 दिन होती है,  विल्ट एवं ड्राई रूट राँट अवरोधी |

कबूली चने की उन्नत विकसित किस्में

जे.जी. – 14

जारी वर्ष – 2009

उत्पादकता 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 113 दिन होती है,  विल्ट, ड्राई रूट राँट एवं पांड बोरर मध्यम अवरोधी |
पूसा – 1003

जारी वर्ष – 1999

उत्पादकता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-145 दिन होती है,  दाना मध्यम बड़ा उकठा सहिष्णु होता है |
एच.के. – 94–134

जारी वर्ष – 2005

उत्पादकता 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 140-145 दिन होती है,  दाना बड़ा उकठा, सहिष्णु होता है |
चमत्कार (वी.जी.–1053)

जारी वर्ष – 2000

उत्पादकता 15-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 135-145 दिन होती है,  दाना बड़ा होता है |
जे.जी.के. – 1 उत्पादकता 17-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 110-115 दिन होती है,  बड़ा दाना उकठा सहिष्णु होता है |
शुभ्रा

जारी वर्ष – 2009

उत्पादकता 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 125 दिन होती है, उकठा अवरोधी होता है |
उज्ज्वल

जारी वर्ष – 2009

उत्पादकता 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, पकने की अवधि 125 दिन होती है,   उकठा अवरोधी होता है |
जी.एन.जी.–1985

जारी वर्ष – 2013

पकने की अवधि 26.8 दिन होती है, (सिंचित दशा में क्षेत्र के लिए)  विल्ट, राँट, स्टट एवं मौलर राँट के प्रति अवरोधी |

जलवायु:

चना एक शुष्क एवं ठण्डे जलवायु की फसल है जिसे रबी मौसम में उगाया जाता हे। चने की खेती के लिए मध्यम वर्षा (60-90 से.मी. वार्षिक वर्षा) और सर्दी वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त है।

फसल में फूल आने के बाद वर्षा होना हानिकारक होता है, क्योंकि वर्षा के कारण फूल परागकण एक दूसरे से चिपक जाते जिससे बीज नही बनते है। इसकी खेती के लिए 24-300 सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। फसल के दाना बनते समय 30 सेल्सियस से कम या 300 सेल्सियस से अधिक तापक्रम हानिकारक रहता है।

भूमि की तैयारी:

चने की खेती दोमट भूमियों से मटियार भूमियों में सफलता पूर्वक किया जा सकता है। चने की खेती हल्की से भारी भूमियों में की जाती है। किन्तु अधिक जल धारण एवं उचित जल निकास वाली भूमियॉ सर्वोत्तम रहती हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्र की भूमि खेती हेतु उपयुक्त हैं क्योंकि इन राज्यों की भूमि अधिक जल धारण क्षमता वाली है जो की चना की खेती हेतु सर्वोतम है ।

इन मृदाओं का पी.एच. मान लगभग 6-7.5 उपयुक्त रहता है। फसल को दीमक एवं कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए अन्तिम जुताई के समय हैप्टाक्लोर (4 प्रतिशत) या क्यूंनालफॉस (1.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) या एन्डोसल्फॉन की (1.5 प्रतिशत) चूर्ण की 25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्‌टी में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिये।

सिंचाई :

समान्यत चने की फसल के लिए कम जल की आवश्यकता होती है। चने में जल उपलब्धता को ध्यान मे रखकर पहली सिंचाई फूल आने के पूर्व लगभग बोने के 45 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई दाना भरने की अवस्था बोने के 75 दिन बाद करना उत्तम रहता है।

खाद एवं उर्वरक :

चने की फसल दलहनी होने के कारण इसकी नाइट्रोजन की कम आवश्यकता होती है क्योंकि चने के पौधों की जड़ों में ग्रन्थियां पाई जाती है। ग्रन्थियों में उपस्थित जीवाणु वातावरण की नाइट्रोजन का जड़ों में स्थिरीकरण करके पौधे की नाइट्रोजन की काफी मात्रा की आवश्यकता की पूर्ति कर देती है। लेकिन प्रारम्भिक अवस्था में पौधे की जड़ों में ग्रंन्थियों का पूर्ण विकास न होने के कारण पौधे को भूमि से नाइट्रोजन लेनी होती है।

अतः नाइट्रोजन की आपूर्ति हेतु 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। इसके साथ 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिये। नाइट्रोजन की मात्रा यूरिया या डाई अमोनियम फास्फेट (डी.ए.पी.) तथा गोबर खाद व कम्पोस्ट खाद द्वारा दी जा सकती है। जबकि फास्फोरस की आपूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट या डीएपी या गोबर व कम्पोस्ट खाद द्वारा की जा सकती है। एकीकृत पोषक प्रबन्धन विधि द्वारा पोषक तत्वों की आपूर्ति करना लाभदायक होता है।

एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिए 2.50 टन गोबर या कस्पोस्ट खाद को भूमि की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से मिट्‌टी में मिला देनी चाहिये। बुवाई के समय 22 कि.ग्रा. यूरिया तथा 125 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट या 44 कि.ग्रा. डीएपी में 5 किलो ग्राम यूरिया मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से पंक्तियों में देना पर्याप्त रहता है।

सुझाव

    • कम और ज्यादा तापमान हानिकारक है।
    • गहरी काली और मध्यम मिट्टी में बोनी करें।
    • िट्टी गहरी,भुरभुरी होना चाहिए।
    • प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता, अच्छी अकुंरण क्षमता वाले बीजों का उपयोग करें। अपने क्षेत्र के लिए अनुमोदित किस्मों का उपयोग करें।
    • मध्य प्रदेश में अक्टूबर के मध्य में बोनी करना चाहिए।
    • यदि सिंचाई उपलब्ध हो तो नवम्बर तक बोनी की जा सकती है।
    • बीज शोधन के तीन दिन पहले बीज उपचार करना चाहिए।
    • राइज़ोनियम से बीज शोधन करना चाहिए।
    • यदि सल्फर और जिंक की कमी हो तो सल्फरयुक्त उर्वरकों और जिंक की उचित मात्रा डालना चाहिए।
    • सुझाव के अनुरूप ही उर्वरकों का उपयोग करें।
    • मिट्टी को ढीली और भुरभुरी करने के निदाई गुडाई करना चाहिए।
    • बुआई के 30 से 35 दिन बाद तक खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए।
    • यदि लौह की कमी हो तो एक हेक्टेयर में 3 किलो फेरस सल्फेट 600 मि.ली. टीपोल 600 लीटर पानी में छिडके।
    • पानी का जमाव हो तो जल निकास की ब्यवस्था करें।
    • कीडों से बचाव हेतू अनुकूल उपाय करें।
    • चने के साथ निम्नलिखित फसलें इस अनुपात में उगाए

चने और कुसुम 6:2 के अनुपात में चने और सरसों 6:2 के अनुपात में चने और अलसी 6:4 के अनुपात में चने और सुरजमूखी 6:4 के अनुपात में

  • फली का रंग पीले से भुरा हो जाए तब कटाई करनी चाहिए।
  • कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखाए।

उर्वरक प्रबंधन

चना एक दलहनी फसल है जो वायुमण्डल से नाइट्रोजन को स्थरीकरण की क्षमता रखते है।

  • फसल को कुछ नाइट्रोजन जीवाणु से मिल जाती है।
  • बाकी नाइट्रोजन खाद इत्यादि से मिल जाती है।
  • 20:50-60 :40 किलो एन.पी.के. प्रति हेक्टेयर का उपयोग बुआई के समय करें।
  • हर तीन साल में 15 से 20 बैलगाड़ी सड़ी गली खाद डालना लाभदायक रहेगा।
  • अत्याधिक नाइट्रोजन से पौधे तो बढ़ते है परन्तु उपज कम हो जाती है।
  • अंकुरण की अवस्था में नाइट्रोजन की कमी नहीं होना चाहिए जिससे नाइट्रोजन स्थरीकरण जीवाणु अच्छी तरह विकसित हो जाए।

सिंचाई प्रबंधन

  • चने की खेती असिंचित फसलों के रूप में होती है, इसलिए अगर एक सिंचाई उपलब्ध हो तो हल्की सिंचाई की जा सकती है।
  • अगर एक सिंचाई उपलब्ध हो तो फूल आने के पहले करनी चाहिए जिससे अच्छे फूल आए और अधिकतम उपज हो।

चने के कीट नियंत्रण :

क्र्मांक न. कीट का नाम रोकथाम
1. फली छेदक मोनाक्रोटोफॉस 40 ई.सी 1 लीटर दर से 600-800 ली. पानी में घोलकर फली आते समय फसल पर छिड़काव करना चाहिए।
2. उकठा रोग कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम या ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम/किलो बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए।
3. कटुआ रोकथाम के लिए 20 कि.ग्रा./हे. की दर से क्लोरापायरीफॉस भूमि में मिलाना चाहिए।

 

चने की बुआई हेतु बीज दर, बीज शोधन एवं बीजोपचार

बीज दर :

छोटे दाने का 75-80 किग्रा. प्रति हेक्टर तथा बड़े दाने की प्रजाति का 90-100 किग्रा./हेक्टर | बोने से पूर्व बीजो की अंकुरण क्षमता की जांच स्वयं जरूर करें। ऐसा करने के लिये 100 बीजों को पानी में आठ घंटे तक भिगो दें। पानी से निकालकर गीले तौलिये या बोरे में ढक कर साधारण कमरे के तामान पर रखें। 4-5 दिन बाद अंकुरितक बीजों की संख्या गिन लें। 90 से अधिक बीज अंकुरित हुय है तो अकुरण प्रतिषत ठीक है। यदि इससे कम है तो बोनी के लिये उच्च गुणवत्ता वाले बीज का उपयोग करें या बीज की मात्रा बढ़ा दें।

बीज शोधन :

बीज जनित रोग से बचाव के लिए थीरम 2.5 ग्राम या 4 ग्राम ट्राइकोडरमा अथवा थीरम 2.5 ग्राम + कार्बोंड़ाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज को बोने से पूर्व शोधित करना चाहिए | बीजशोधन कल्चर द्वारा उपचारित करने के पूर्व करना चाहिए |

बीजोपचार :

राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार :

अलग-अलग दलहनी फसलों का अलग-अलग राइजोबियम कल्चर होता है चेन हेतु मीजोराइजोबियम साइसेरी कल्चर का प्रयोग होता है | एक पैकेट 200 ग्राम कल्चर 10 किग्रा. बीज उपचार के लिए पर्याप्त होता है | बाल्टी में 10 किग्रा. बीज डालकर अच्छी प्रकार मिला दिया जाता है ताकि सभी बीजों पर कल्चर लग जायें | इस प्रकार राइजोबियम कल्चर से सने हुए बीजों को कुछ देर बाद छाया में सुखा लेना चाहिए | पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग अवश्य करें |

सावधानी :

राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करने से बाद धुप में नहीं सुखाना चाहिए ओंर जहाँ तक सम्भव हो सके, बीज उपचार दोपहर के बाद करना चाहिए ताकि बीज शाम को ही अथवा दुसरे दिन प्रातः बोया जा सकें |

चने की बुआई इस तरह करें :

असिंचित दशा में चने की बुआई अक्टूबर के द्वितीय अथवा तृतीय सप्ताह तक आवश्यक कर देनी चाहिए | सिंचित दशा में बुआई नवम्बर के द्वितीय साप्ताह तक तथा पछैती बुआई दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है | बुआई हल के पीछें कूंडो में 6-8 से.मी. की गहराई पर करनी चाहिए | कूंड से कूंड की दुरी असिंचित तथा पछैती दशा में बुआई में 30 सेमी. तथा सिंचित एवं काबर या मार भूमि में 45 सेमी. रखनी चाहिए |

खाद या उर्वरक का प्रयोग

सभी प्रजातियों के लिए 20 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस, 20 किग्रा. पोटाश एवं 20 किग्रा. गंधक का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से कूंडो में करना चाहिए | संस्तुति के आधार पर उर्वरक प्रयोग अधिक लाभकारी पाया गया है | असिंचित अथवा देर से बुआई की दशा में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का फूल आने के समय छिडकाव करें |

चने की फसल में सिंचाई :

  • पहली सिंचाई शाखायें बनते समय (बुवाई के 45 – 60 दिन बाद) तथा दूसरी सिंचाई फली बनते समय देने से अधिक लाभ मिलता है |
  • चना में फुल बनने की सक्रिय अवस्था में सिंचाई नहीं करनी चाहिए | इस समय सिंचाई करने पर फुल झड सकते हैं एवं अत्यधिक वानस्पतिक वृद्धि हो सकती है | रबी दलहन में हल्की सिंचाई (4 – 5 से.मी.) करनी चाहिए क्योंकि अधिक पानी देने से अनावश्यक वानस्पतिक वृद्धि होती है एवं दाने की उपज में कमी आती है |
  • प्राय: चने की खेती असिंचित दशा में की जाती है | यदि पानी की सुविधा हो तो फली बनते समय एक सिंचाई अवश्य करें | चने की फसल में स्प्रिंकलर (बौछारी विधि) से सिंचाई करें |

शीर्ष शाखायें तोडना (खुटाई)

खेत में चना के पौधे जब लगभग 20 – 25 से.मी. के हों तब शाखाओं के ऊपरी भाग को आवश्यक तोड़ दें | एसा करने से पौधों में शाखाये अधिक निकलती हैं और चने में उपज अधिक प्राप्त होती अहि | चना की खटाई बुवाई के 30–40 दिनों के भीतर पूर्ण करें तथा 40 दिन बाद नहीं करनी चाहिए |

चने की फसल में लगने वाले मुख्य कीट

कटुआ कीट

इस कीट की भूरे रंग की सूडियां रात में निकल कर नये पौधों की जमीन की सतह से काट कर गिरा देती है | कटुआ कीट वानस्पतिक अवस्था में एक सुंडी प्रति मीटर तक आर्थिक क्षति पहुँचता है |

अर्द्धकुण्डलीकार कीट (सेमीलूपर)

इस कीट की सुड़ियाँ हरे रंग की होती है जो लूप बनाकर चलती है | सुड़ियाँ पत्तियों, कोमल टहनियों, कलियों, फूलों एवं फलियों को खाकर क्षति पहुँचती है | अर्द्धकुंडलीकार कीट फूल एवं फलियाँ बनते समय 2 सूडी प्रति 10 पौधें आर्थिक क्षति पहुँचाता है |

फली बेधक कीट :

इस कीट की सुड़ियाँ हरे अथवा भूरे रंग की होती है | सामान्यतयः पीठ पर लम्बी धारी तथा किनारे दोनों तरफ पतली लम्बी धारियाँ पायी जाती है | नवजात सुड़ियाँ प्रारम्भ में कोमल पत्तियों को खुरच कर खाती है तथा बाद में बड़ी होने पर फलियों में छेद बनाकर सिंर को अन्दर कर दोनों को खाती रहती है | एक सूडी अपने जीवन काल में 30-40 फलियों को प्रभावित कर सकती है | तीव्र प्रकोप की दशा में फलियां खोखली हो जाती है तथा उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होता है | फलीबेधक कीट फूल एवं फलियां बनते समय 2 छोटी अथवा 1 बड़ी सूडी प्रति 10 पौधा अथवा 4-5 नर पतंगे प्रति गंधपाश लगातार 2-3 दिन तक मिलने पर आर्थिक क्षति पहुँचाता है |

नियंत्रण के उपाए :

  • गर्मी में (मई-जून) गहरी जुताई करनी चाहिए | समय से बुआई करनी चाहिए |
  • खेत में जगह-जगह सुखी घास के छोटे-छोटे ढेर को रख देने से दिन में कटुआ कीट की सुड़ियाँ छिप जाती है जिसे प्रातः काल इकटठा कर नष्ट कर देना चाहिए |
  • चने के साथ अलसी, सरसों, धनियाँ की सहफसली खेती करने से फली बेधक कीट से होने वाली क्षति कम हो जाती है |
  • खेत के चारों ओर गेंदे के फूल को ट्रैप क्राप के रूप में प्रयोग करना चाहिए |
  • एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में 50-60 बर्ड पर्चर लगाना चाहिए, जिस पर चिड़ियाँ बैठकर सुडियों को खा सके |
  • फसल की निगरानी करते रहना चाहिए | फूल एवं फलियां बनते समय फली बेधक कीट के लिए 5 गंधपाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाना चाहिए |
  • यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए |

रासायनिक नियंत्रण

  • कटुआ कीट के नियंत्रण हेतु क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर बुआई से पूर्व मिट्टी में मिलाना चाहिए |
  • चने में फलीबेधक कीट के नियंत्रण हेतु एन.पी.वी. (एच) 250 एल. ई. प्रति हेक्टेयर लगभग 250-300 लीटर पानी में घोलकर सांयकाल छिडकाव करें |
  • फलीबेधक कीट एवं अर्द्धकुण्डलीकार कीट के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित जैविक / रासायनिक कीटनाशकों में से किसी एक रसायन का बुरकाव अथवा 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिडकाव करना चाहिए |
  • बेसिलस थूरिन्जिएन्सिस (बी.टी) (कस्र्त्की) प्रजाति 1.0 किलोग्राम |
  • एजाडिरैक्टिन 0.03 प्रतिशत डब्लू.एस.पी. 2.5-3.00 किलोग्राम |
  • एन.पी.वी. आफ हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा 2 प्रतिशत ए.एस. 250-300 मिली.

खेत की निगरानी करते रहे | आवश्यकतानुसार ही दूसरा बुरकाव / छिडकाव 15 दिन के अन्तराल पर करें | एक कीटनाशी को दो बार प्रयोग न करें |

चने की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग :

जड़ सडन :

बुआई के 15-20 दिन बाद पौधा सूखने लगता है | पौधे को उखाड़ कर देखने पर तने पर रुई के समान फफूंदी लिपटी हुई दिखाई देती है | इसे अगेती जड़ सडन करते है | इस रोग का प्रकोप अक्टूबर से नवम्बर तक होता है | पछेती जड़ सडन में पौधे का तना काला होकर सड़ जाता है तथा तोड़ने पर आसानी से टूट जाता है | इस रोग का प्रकोप फरवरी एवं मार्च में अधिक होता है |

उकठा :

इस रोग में पौधे धीरे-धीरे मुरझाकर सुख जाते है | पौधे को उखाड़ कर देखने पर उसकी मुख्य जड़ एवं उसकी शाखायें सही सलामत होती है | छिलका भूरा रंग का हो जाता है तथा जड़ को चीर कर देखें तो उसके अन्दर भूरे रंग की धारियां दिखाई देती है | उकठा का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था में हो सकता है |

एस्कोकाइटा पत्ती धब्बा रोग :

इस रोग में पत्तियों एवं फलियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है | अनुकूल परिस्थिति में धब्बे आपस में मिल जाते है जिससे पूरी पत्ती झुलस जाती है |

रोग नियंत्रण के उपाय :

शस्य क्रियायें

  • गर्मियों में मिट्टी पलट हल से जुताई करने से मृदा जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है |
  • जिस खेत में प्रायः उकठा लगता हो तो यथा सम्भव उस खेत में 3-4 वर्ष तक चने की फसल नहीं लेनी चाहिए |
  • अगेती जड़ सडन से बचाव हेतु नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में बुआई करनी चाहिए |
  • उकठा से बचाव हेतु अवरोधी प्रजाति की बुआई करना चाहिए |
बीज उपचार :

बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत + कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत (2:1) 3.0 ग्राम अथवा ट्राइकोडरमा 4.0 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधित कर बुआई करना चाहिए |

 भूमि उपचार :

भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बायोपेस्टीसाइड (जैवकवक नाशी) ट्राइकोडरमा विरिडी 1 प्रतिशत डब्लू.पी. अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. प्रति हे. 60-75 किग्रा, सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से चना के बीज / भूमि जनित रोगों का नियंत्रण हो जाता है |

पर्णीय उपचार :

एस्कोकाइटा पत्ती धब्बे रोग के नियंत्रण हेतु मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.0 किग्रा. अथवा कापर अक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी की 3.0 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 500-600 लीटर पानी घोलकर छिडकाव करना चाहिए |

चने की फसल में प्रमुख खरपतवार :

बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, चटरी-मटरी, अकरा-अकरी, जंगली गाजर, गजरी, प्याजी, खरतुआ, सत्यानाशी आदि |

नियंत्रण के उपाय :

खरपतवारनाशी रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने हेतु फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत ई.सी. की 2.2 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिलान चाहिए | अथवा पेंडीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर अथवा एलाक्लोर 50 प्रतिशत ई.सी. की 4.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर उरोक्तानुसार पानी में घोलकर फ्लैट फैन / नाजिल से बुआई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिडकाव करें | क्यूजालोफोप-इथाइल 5 प्रतिशत ई.सी. की 2.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर 500 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के 20-30 दिनों बाद करने पर सकरी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रण कर सकते है | अतः बुआई से 2-3 दिनों के अन्दर पेंडीमेथलीन एवं 20-30 दिनों बाद क्यूजालोफोप-इथाइल का प्रयोग कर सभी प्रकार के खरपतवारों को नियंत्रित कर सकते है | यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो खुरपी से निराई कर खरपतवारों का नियंत्रण करना चाहिए |

कटाईमड़ाई एवं भण्डारण

चना की फसल की कटाई विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु, तापमान, आर्द्रता एवं दानों में नमी के अनुसार विभिन्न समयों पर होती है।

  • व फली से दाना निकालकर दांत से काटा जाए और कट की आवाज आए, तब समझना चाहिए कि चना की फसल कटाई के लिए तैयार हैं
  • व चना के पौधों की पत्तियां हल्की पीली अथवा हल्की भूरी हो जाती है, या झड़ जाती है तब फसल की कआई करना चाहिये।
  • व फसल के अधिक पककर सूख जाने से कटाई के समय फलियाँ टूटकर खेत में गिरने लगती है, जिससे काफी नुकसान होता है। समय से पहले कटाई करने से अधिक आर्द्रता की स्थिति में अंकुरण क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। काटी गयी फसल को एक स्थान पर इकट्ठा करके खलिहान में 4-5 दिनों तक सुखाकर मड़ाई की जाती है।
  • व मड़ाई थ्रेसर से या फिर बैलों या ट्रैक्टर को पौधों के ऊपर चलाकर की जाती है।

टूटे-फूटे, सिकुडत्रे दाने वाले रोग ग्रसित बीज व खरपतवार भूसे और दानें का पंखों या प्राकृतिक हवा से अलग कर बोरों में भर कर रखे । भण्डारण से पूर्व बीजों को फैलाकर सुखाना चाहिये। भण्डारण के लिए चना के दानों में लगभग 10-12 प्रतिशत नमीं होनी घुन से चना को काफी क्षति पहुंचती है, अतः बन्द गोदामों या कुठलों आदि में चना का भण्डारण करना चाहिए। साबुतदानों की अपेक्षा दाल बनाकर भण्डारण करने पर घुन से क्षति कम होती है। साफ सुथरें नमी रहित भण्डारण ग्रह में जूट की बोरियाँ या लोहे की टंकियों में भरकर रखना चाहिये।

उपज एवं भण्डारण :

चने की फसल को प्रति हेक्टेयर लगभग 20-25 क्विं. दाना एवं इतना ही भूसा प्राप्त होता है। काबूली चने की पैदावार देशी चने से तुलना में कुछ कम देती है। भण्डारण के समय विशेष 10-12 प्रतिशत नमी रहना चाहिए।

 

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